14/3/17

The Result of Bad Habits

Once upon a time a fox lived in a dense forest with other wild animals. Some of the animals lived in caves and others in burrows. The fox was careless and overbearing. He used to wander throughout the day and didn't think of making a home. He was aggressive and occupied the homes of other animals daily at night to live in. It was his daily routine. He was physically mighty, so no animal dared to stand up to him. He was clever to enough to keep himself away from mightier animals. He was proud of his physical strength. Often he boased when he was among small animals. No one liked his nature. The peace loving animals didn't oppose him in order to avoid a row.
Once he was passing through a village with some other animals of the jungle. The village dogs were barking. They had sensed the presence of the animals. The other animals had full confidence in the fox. They thought that he would provide them security in danger. The fox would often say that he was fearless and would face any situation.
The fox pretended to be fearless and the animals. Now the dogs were close to them and the fox guessed it. The bow-wow of the dogs became louder. The fox began to run faster. the rest of the beasts thought that the fox would make the dogs run away. But contrary to it the fox himself wanted to escape. The animals came to know the reality as they ran away and saved their lives.
The dogs chased the fox. they wounded the hind legs of the fox Luck favoured him and seeing a burrow nearby he slipped into it to save his life.
An empty vessels sounds much. Now everyone was familiar with the meaning of this proverb. The animals had learnt about the false bravery of the fox. When the dogs returned, he came out of the burrow. The animals provided him medical aid and soon he recovered from his injuries. He mended the habit to speaking high because he felt ashamed. But he didn't reform the habit of shirking work. Laziness was his main weakness. He often wished that someone else should make his burrow.
The season of winter came. it was shivering cold that year. All The animals were in their homes. There was no place for the fox to live in. He was forced to live in the open. When the severe told ate into his bones he would run to find shelter. Every Night he took an oath that he would prepare a burrow the next day. He always forgot his own oath in the warm sun of the day. The days passed and he didn't make any burrow.
             It was mid winter. Chilly gusts of wind were blowing. A cold drizzle was falling. All of a sudden the wind stopped. A hailstorm broke out. The fox ran in search of shelter. No one came to help him.
In the morning when the animals came out of their homes, they saw the fox was dead. their harts were filled with pity. Showing the dead fox they told their young ones, The result of laziness and shirking work is fatal. 

3/2/17

आत्मविश्वास The power of selfconfidence.

            दोस्तों आज मै आप लोगों के साथ आत्मविश्वास पर कुछ विचार रखना चाहता हूँ
दोस्तों व्यक्ति जब स्वयं पर विश्वास करता है तो ही उसका आत्मबल प्रकट होता है। और जिस व्यक्ति के अंदर आत्मबल कुट-कुट कर भरा हुआ हो, वह अपने लिए अनेक अवशर उतपन्न कर लेता है और पारिस्थितियों से जूझकर सफलता पाता है। यदि हम अपने मन में अविश्वास और विफलता का विचार लाते है, तो कभी सफल नहीं हो सकते। दोस्तों इसके विपरीत जिन लोगों का खुद पर विशवास होता है, वो हमेशा सफल होते हैं। दोस्तों हमे दुनिया में अनेक उदाहरण मिलते है जो यह दर्शाते है कि व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास होने पर, उनके रास्तो पर अनेकों कठिनाई होने पर भी आगे बढ़ते चले गए तथा रास्ते स्वयं बनते चले गए। और उस व्यकि के आगे परिस्थितियों को भी हार माननी पड़ी।
            दोस्तों कुछ उदाहरण आपके पास रख रहा हूँ जो यह साबित करते है की आत्मविश्वास के बल पर ही असम्भव सा काम कर दिखाया।
             खुद पर विश्वास के कारण ही 'जॉन ऑफ़ आर्क' जैसी फ़्रांसिसी सेना का नेतृत्व एक ग्रामीण लड़की ने किया। इतना ही नहीं उसके इस प्रबल आत्मविश्वास के कारण ही फ़्रांस के राजा को भी उसके आदेशों का पालन करना पड़ा। विलियम पिट को भी जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्रि पद से हटाया गया तब उन्होंने डेवनशायर के ड्यूक से बड़े ही आत्मविशवास के साथ कहा था कि 'इस देश को मैं ही बचा सकता हूँ, इस काम को मेरे शिवा कोई दूसरा नहीं कर सकता ' 11 हफ्ते तक इंग्लैण्ड में बिना प्रधानमंत्री के ही काम चलता रहा और अंत में 'पिट' को ही योग्य मानते हुए शासनाधिकार सौप दिया गया।
                 इसी तरह नेपोलियन, लूथर, बिस्मार्क, और सेवनारोला जैसे सामान्य लोग अपने प्रबल आत्मविशवास के कारन ही महान लोगों की श्रेणी में आ गए और अपने जीवन में आश्चर्यजनक सफलताएं प्राप्त कर सके।
                  प्रसिद्ध मानव व्यवहार विशेषज्ञ ग्रेस फ्लेमिंग,आत्मविश्वास को सफलता की कुंजी मानते हैं। अपनी चर्चित पुस्तक 'बिल्डिंग सेल्फ कॉन्फिडेंस' में उन्होंने कहा की 'यदि मनुष्य अपना आत्मविश्वास बढ़ाना चाहते हैं तो तो सबसे पहले अपनी कमजोरियों को पहचाने तथा उन्हें दूर करने की खुद में शक्ति पैदा करें। ये कमजोरियाँ हमारे व्यक्तित्व में किसी भी प्रकार के हो सकती हैं, जैसे- हमारा खराब स्वास्थ्य, रूप -रंग, पारिवारिक पृष्ठभूमि, वजन, गुण, बुरिआदतें, अथवा गरीबी आदि कुछ भी हो सकता है। हमें अपनी कमजोरियों के तह में जाकर इनको दूर करने का कारगर उपाय खोजना चाहिए। अपनी इन कमजोरियों का मुकाबला करने में सबसे पहले हमें डर लगेगा, लेकिन हम डर को दूर कर के ही हम अपनी कमजोररियों को दूर कर सकेंगे और अपने आत्मविश्वास को बढा सकेंगे।'  
                    दोस्तों कमजोरियों को जानना ही जरुरी नहीं है, बल्कि इनके भीतर शक्ति को तलाशना भी आवश्यक है। हर व्यक्ति दुर्लभ प्रतिभा को लेकर संसार में आता है। उस नैसर्गिक प्रतिभा से आत्मविस्वास की पूंजी में विस्तार संभव है। 

 दोस्तों इस लेख को पढ़ने और अपना कीमती समय देने के लिये धन्यवाद। 
अगर आपको अच्छा लगा हो तो like जरूर करें।   

28/1/17

सच्चाई और ईमानदारी की मिशाल।


             आज मै आप लोगो के साथ एक सच्ची घटना का  उल्लेख करना चाहता हूँ। आशा है की आप लोगो को जरूर अच्छा लगेगा। 
              अमेरिका के छोटे से गांव के एक गरीब परिवार में एक बालक रहता था। मेहनत-मजदूरी करके उसे जो भी मिलता था, वह उनसे अपना खर्च चलाया करता था। 
उसको एक दिन पता चलता है कि उसके घर से थोड़ी दूरी पर एक व्यक्ति रहता है, जिसके पास जॉर्ज वाशिंगटन का जीवन चरित्र है। उसने उस व्यक्ति से पढ़ने के लिए वह पुस्तक मांग ली, पर जब लौटाने का दिन आया तो उस दिन भयंकर बारिश होने लगी। उस बरसात में वह पुस्तक भीग गई। भीगने की वजह से वह वह पुस्तक पूरी तरह से खराब हो गया। वह बालक बहुत दुखी हुआ, फिर उसने उस व्यक्ति से बोला-- "मैं आपको यह पुस्तक खरीदकर तो नहीं दे सकता, पर इसके बदले का परिश्रम करके मैं इसका मूल्य अवश्य चूका दूंगा। " वह व्यक्ति उसकी श्रमशीलता व् ईमानदारी से अत्यन्त प्रभावित हुआ। उसने वह पुस्तक भेंटस्वरूप दे दी। दोस्तों क्या आप जानते है की यह बालक कौन था? यही श्रमशील व ईमानदार बालक आगे चलकर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के रूप में प्रसिद्ध हुआ।  

31/12/16

बुद्धिमान बीरबल the witty birbal

                   दोस्तों आज मैं आप लोगो को बीरबल की चतुराई से संबंधित एक कहानी बताता हूँ।
             बीरबल अपनी बुद्धि और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था। उसकी बुद्धि की खबरें आम हैं। अक्सर लोग उसकी बुदधि, कार्य और निर्णय के बारे में बात करते हैं। उसका नाम सम्मान और आदर के साथ याद किया जाता है। वह सम्राट अकबर के दरबार में नौ रत्नों में से एक था। राजा उसे हमेशा याद करता  जब भी वह मुश्किल में होता था।
            वहाँ अकबर के खज़ाने में सोने, मोती और हीरे के कई अंगूठी थे। उनको एक अंगूठी सबसे ज्यादा पसंद था। इसके केंद्र में एक बड़ा हीरा और उसके चारों ओर मोतियों से जड़ा था। आठ सेवक उसके कीमती कपड़े और आभूषणो के रखवाली का काम देखते थे । वे वफादार सेवक थे। और वे राजा को दरबार के लिये तैयार भी करते थे। किसी को भी उस अंदरूनी कमरे में जाने की अनुमति नहीं होती थी। राजा को अपने सेवकों पर भरोसा था।
            यह एक विशेष अवसर था।अदालत में बैठक  आयोजित किया गया था। अकबर इस अवसर पर अपनी वाही पसंदीदा अंगूठी को पहनना चाहता था। अकबर सेवकों में से एक से कहा, सबसे खूबसूरत अंगूठी ले आओ।
सेवकों को पता था कि कौन अंगूठी लाया जाना था। वह जवेलरी वाले कमरे में चला गया। वह अंगूठी खोजने का बहुत प्रयास किया किंतु वह अंगूठी को खोजने में सफल नहीं हुआ।  वह वापस राजा के पास गया। राजा से कहा, "महाराज! मैं अंगूठी नहीं ला सकता हूँ । मैं नहीं जानता कि वह कहाँ है।"
             अकबर दुखी हो गया। अंगूठी कौन चुरा लिया एक रहस्य था। वह अंगूठी के खोज करने के लिए अपने मुख्यमंत्री का आदेश दिया। लेकिन मुख्यमंत्री भी काम नहीं कर पा रहा था। हर एक को पता था कि केवल बीरबल समस्या का समाधान कर सकता है। जब भी इस तरह की समस्या उठी है बीरबल ने ही समस्या का हल निकाला है। कैसी भी समस्या थी, बीरबल यह कुछ ही समय के भीतर हल किया।
बीरबल कर्मचारियों से जो खजाना को देख रहे थे बुलाया। प्रत्येक सेवकों को एक ही आकार की एक-एक छड़ी दी गई। ।        
              बीरबल ने कहा अंगूठी चोर की छड़ी एक इंच रात को बढ़ जाएगा।  उन्होंने अगले दिन सभी को छड़ी के साथ वापस आने के लिए कहा ।
              अगली सुबह सभी नौकर दरबार में आए । सेवकों में से एक की छड़ी दूसरों के उन लोगों की तुलना में एक इंच कम था।वह नौकर जो अंगूठी चोरी की थी एक इंच से अपनी छड़ी में कटौती की थी। वह पकड़ा गया।
               उसने अपने अपराध कबूल कर लिया। उसने सोचा था कि अपनी छड़ी वास्तव में एक इंच बड़ा हओ जाएगा जैसा कि बीरबल ने कहा था, इसलिए वह पकड़े जाने के डर से बचने के लिए छड़ी को काट दिया था।
                इस तरह हर एक ने  बीरबल की सराहना की और राजा अकबर ने उसे पुरस्कृत किया। 

29/12/16

Witty birbal चतुर बीरबल Story

         
 Birbal was famous for his wit and wisdom. Stories of his wit are common. Often people talk about his witty acts and judgements. His name is remembered with respect and regard. he was one of the nine gems in the court of Emperor akbar. the king always asked for him whenever he was in difficulty.
There were many rigs of gold, pearl and diamond in the treasury of Akbar. He liked one ring the most. It was one with a latge diamond at the centre and pearls around it. Eight servants looked after his precious clothes and jewellery. They were considered loyal servants. They also helped the king to get ready for the court. Nobody else was permitted to enter he's inner apartment. The king had full faith in his servants.
It was a special occasion. Ameeting was to be held in the court. Akbar wanted to wear he's favourite ring. Akber saed to one of the servants, Bring the most beautiful ring .
The servants knew which ring had to be brought. Hi went into the jewllery toom. He tried he's best to find the ring. When he could not fined it, he went back to the king. Hi said to to the king, "your majesty! I could not find the ring. I don't know where it is."
akbar became sad. Who stole the ring was a mystery. he ordered his Chief Minister to search for the ring. But the Chief Minister was also unable to do the job. Eviry one knew that only birbal could solve the problem. Whenever a problem like he's arose Birbal coud sove the problem. however difficult the problem was, birbal solved it within no time.
birbal called the servants who were looking after the treasury. Each servants was given a stick of the same dize. Birbal told the servant that the stick of the thief of the ring would grow by one inch that night. he asked them to come back with the stick the next day.
The servant came the next morning. the stick of one of the servats was shorter than those of rhe others. The servant who had stolen the ring had cut his stick by one inch. He was caught. He confessed his guilt. He had thought that his stick would really grow by one inch as Birbal had said, so he had cut it to avoid getting caught.
every one applauded Birbal and the king rewarded him

परमाणु बम और हाइड्रोजन बम में अंतर Diffrence between Atom bomb and hydrojan bomb


          दोस्तों आज मैं आप लोगों को बहुत ही विनाशकारी बमों परमाणु बम तथा हाइड्रोजन बम की सामान्य जाकारी  देने जा रहा हूँ। दोस्तों जैसा की आप जानते है की ये दोनों ही बम बहुत ही विनाशकरी होते है तथा दोनों के इस्तेमाल से पूरी मानव जाती का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है। इसीलिए इसके अप्रसार के लिए कई प्रयास हो रहे हैं तथा कई अंतराष्ट्रीय संधि किए गए हैं। 
          दोस्तों इन दोनों बमों के निर्माण का तरीका भी अलग अलग होता है चलिये इसी को समझते हैं। 
1.परमाणु बम :-इसे Nuclear Bomb या Atom bombभी कहते हैं। यह नाभिकीय विखंडन की अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रियापर आधारित होता है। इसमें U-235 ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस पर न्यूट्रान की बमबारी से यह क्रिया शुरू हो जाती है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा U-235 युक्त परमाणु बम (लिटिल बॉय) तथा नागाशाकी पर pu-239 से युक्त परमाणु बम (फैटमैन) गिराया था जिनमें लाखों लोगों की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया था।

2. हाइड्रोजन बम - यह नाभिकीय संलयन प्रक्रिया पर आधारित होता है। इसके लिए उच्च ताप व उच्च दाब की आवश्यकता होती है। अतः हाइड्रोजन बम बनाने के लिए पहले परमाणु बम बनाया जाता है, जो उच्च कोटि का ताप व दाब उत्पन्न करता है। फलस्वरूप हाइड्रोजन के नाभिक एक - दूसरे के अत्यन्त निकट आ जाते हैं और संलयित (जुड़) हो जाती है। इस क्रिया में अत्यधिक ऊर्जा निकलती है। हिड्रोजन बम, परमाणु बम से कहीं  अधिक विनाशकारी होता है परमाणु बम का आकार एक सिमा से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता लेकिन हाइड्रोजन बम का आकार कुछ भी रखा जा सकता है।जिससे इसकी विनाश की क्षमता और बढ़ जाती है। 

15/12/16

महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह का आखरी पत्र

           दोस्तों आज मैं भगत सिंह के उस आखरी पत्र के बारे में जानकारी दे रहा हूँ जिसे उन्होंने फंसी पर चढ़ने से ठीक एक दिन पहले लिखा था। साथियों मेरा आपसे विनम्र गुजारिश है अगर आपके दिल में हमारे शहीदों के प्रति जरा भी सम्मान है तो इसे जरूर पढें। साथियों भगत सिंह ने  जब यह पत्र लिखा था तो उनके मन में मौत का तनिक भी भय नही था और न ही फाँसी दिए जाने का पछतावा। उनके पत्र का जिक्र करने से पहले मैं आपको भगत सिंह के बारे में संक्षेप में कुछ जानकारी देना चाहता हूँ।
            दोस्तों हमारे देश के महान पुरुष क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर सन् 1907 को पश्चिम पंजाब के लायलपुर जिले के बंग गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम सरदार किशनसिंह था। बचपन से ही  क्रांतिकारी विचारों वाले भगतसिंह ने अपने जीवन में ब्रिटिश उपनिवेशवादी शक्तियों को तथा उसके साम्राज्य को उखाड़ फेकने का संकल्प ले लिया था। अपने क्रन्तिकारी साथियों -चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद 'बिस्मिल', अश्फाक उल्ला खाँ के साथ मिलकर उन्होंने एक  क्रांतिकारी संगठन 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' बनाया। साइमन कमीशन का बहिष्कार करते हुए इस संगठन ने लाला लाजपत राय के ऊपर हुए प्राणघातक हमले का विरोध किया। जिनका कुछ दिनों के बाद निधन हो गया।उन्होंने इस घटना के जिम्मेदार पुलिश अधीक्षक सांडर्स की हत्या कर इसका बदला लिया 8 अप्रैल सन् 1929 को एसेम्बली हॉल में बम फेककर 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाते हुए स्वयं को गिरफ्तार करवा लिया। उनको और उनके अन्य दो साथीयों रामप्रसाद बिश्मिल और अशफाक उल्ला खाँ को 23 मार्च सन् 1931 को फाँसी दे दी गई। बलिदान के एक दिन पहले अपने  क्रांतिकारी कैदी साथियों को लिखे हुए तीसरे पत्र से उनकी त्याग भावना,देश के लिए भक्ति और सर्वस्व समर्पण का दृढ संकल्प स्पष्ट प्रकट होता है। उनका चरित्र निश्चय ही प्रेरणा का स्रोत है।
            बलिदान से ठीक एक दिन पहले कैदी साथियों को लिखा गया अंतिम पत्र 

         साथियो !                                  22 मार्च, 1931
         स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता; लेकिन मैं एक शर्त पर जिन्दा रह सकता हूँ कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता।
          मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतिक बन चूका है और  क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा हरगिज नहीं हो सकता। 
           आज मेरी कमजोरियां जनता के सामने नहीं है। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वे जाहीर हो जाएंगी  और क्रांति का प्रतिक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए। लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों को भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए क़ुरबानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी। 
            हाँ, एक विचार भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरते पूरी कर सकता। इसके शिवाय मेरे मन में कभी लालच फाँसी से बचने का नहीं आया। मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा ? आज मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है, कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।

                                                                                                                                         आपका साथी

खंडगिरी और उदयगिरी गुफाएँ – इतिहास की पत्थरों पर उकेरी कहानी

     स्थान: भुवनेश्वर, ओडिशा      प्रसिद्धि: प्राचीनजैन गुफाएँ, कलात्मक शिल्पकला, ऐतिहासिक महत्व  परिचय भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक ...